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कोरोना के बाद आर्थिक तंगी बनी सबसे बड़ी मुसीबत, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देश हुए परेशान

कोरोना संक्रमण ने एशिया और यूरोप के साथ साथ खाड़ी देशों में भी भारी तबाही मचाया है। खाड़ी देशों रईस देशों में कच्चे तेल के दाम में गिरावट कोरोना के बाद दूसरी सबसे बड़ी मुसीबत है। तेल की कीमत में गिरावट के बाद सऊदी अरब ने आर्थिक संकट से बचने के लिए नागरिकों पर टैक्स बढ़ा दिया साथ ही सुविधाएं कम कर दी। सऊदी अरब का इस साल बहुत ही अधिक नुकसान हुआ है। दरअसल हज यात्रा सऊदी अरब की कमाई का एक बड़ा और महत्वपूर्ण जरिया है लेकिन इस साल कोरोना की वजह से यात्रा पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।

कोरोना की वजह से सऊदी ने इस वर्ष केवल 10,000 घरेलू तीर्थयात्रियों को हज करने की अनुमति देने का फैसला किया, जिनमें से 70 प्रतिशत प्रवासी थे और शेष 30 प्रतिशत सऊदी नागरिक थे। हज के महीने में हर सप्ताह करीब 2.5 मिलियन लोग मक्का और मदीना में इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं, हर साल सऊदी अरब को इससे करीब 12 बिलियन डॉलर की कमाई होती है।

खाड़ी देश कुवैत का हाल भी कुछ ज्यादा अच्छा नहीं है। कोरोना संक्रमण से उतपन्न हुई आर्थिक संकट की वजह से कुवैत के पास अब कैश इतना कम है कि अक्टूबर के बाद सरकारी कर्मचारियों को सैलरी दे पाना भी मुश्किल होगा। खर्च में कटौती न हो पाने और तेल से कमाई लगातार घटने के चलते यह स्थिति पैदा हुई है।

कुवैत ने देश में प्रवासियों की संख्या को कम करने का निर्णय लिया है, एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 8 लाख प्रवासियों को कुवैत छोड़ना पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में कुवैत को और भी आर्थिक संकट होने वाली है क्योंकि प्रवासियों के जाने से बहुत से सेक्टर्स में काम की गति धीमी पड़ जाएगी।

कुवैत को पहले ही ईरान-इराक युद्ध से बहुत नुकसान झेलना पड़ा है। कुवैत अब भी अपनी आय के 90% हिस्से के लिए हाइड्रोकार्बन पर निर्भर है। ऐसे में आने वाले समय में अगर कुवैत ने आय का कोई मजबूत जरिया नहीं तलाशा तो कुवैत एक बड़े आर्थिक संकट से घिर जाएगा। कुवैत 1970 के दशक में सबसे गतिशील खाड़ी राज्यों में से था।

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